श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.7.20

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

पदार्थेषु यथा द्रव्यं सन्मात्रं रूपनामसु।

बीजादिपंचतान्तासु ह्यवस्थासु युतायुतम्॥ २०

padārtheṣu yathā dravyaṃ sanmātraṃ rūpanāmasu|

bījādipaṃcatāntāsu hyavasthāsu yutāyutam|| 20

अर्थ

नामविशेष और रूपविशेषसे युक्त पदार्थोंपर विचार करें तो वे सत्तामात्र वस्तुके रूपमें सिद्ध होते हैं। उनकी विशेषताएँ लुप्त हो जाती हैं। असलमें वह सत्ता ही उन विशेषताओंके रूपमें प्रतीत भी हो रही है और उनसे पृथक् भी है। ठीक इसी न्यायसे शरीर और विश्‍वब्रह्माण्डकी उत्पत्तिसे लेकर मृत्यु और महाप्रलयपर्यन्त जितनी भी विशेष अवस्थाएँ हैं, उनके रूपमें परम सत्यस्वरूप ब्रह्म ही प्रतीत हो रहा है और वह उनसे सर्वथा पृथक् भी है। यही वाक्य-भेदसे अधिष्ठान और साक्षीके रूपमें ब्रह्म ही पुराणोक्त आश्रयतत्त्व है॥ २०॥

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