श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.8.13

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

इत्थं बृहद्व्रतधरस्तपस्स्वाध्यायसंयमैः।

दध्यावधोक्षजं योगी ध्वस्तक्लेशान्तरात्मना॥ १३

itthaṃ bṛhadvratadharastapassvādhyāyasaṃyamaiḥ|

dadhyāvadhokṣajaṃ yogī dhvastakleśāntarātmanā|| 13

अर्थ

आजीवन ब्रह्मचर्य-व्रतधारी एवं योगी मार्कण्डेयजी इस प्रकार तपस्या, स्वाध्याय और संयम आदिके द्वारा अविद्या आदि सारे क्लेशोंको मिटाकर शुद्ध अन्तःकरणसे इन्द्रियातीत परमात्माका ध्यान करने लगे॥ १३॥

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