श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.8.30

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

इतीन्द्रानुचरैर्ब्रह्मन् धर्षितोऽपि महामुनिः।

यन्‍नागादहमो भावं न तच्चित्रं महत्सु हि॥ ३०

itīndrānucarairbrahman dharṣito'pi mahāmuniḥ|

yannāgādahamo bhāvaṃ na taccitraṃ mahatsu hi|| 30

अर्थ

शौनकजी! इन्द्रके सेवकोंने इस प्रकार मार्कण्डेयजीको पराजित करना चाहा, परन्तु वे रत्तीभर भी विचलित न हुए। इतना ही नहीं, उनके मनमें इस बातको लेकर तनिक भी अहंकारका भाव न हुआ। सच है, महापुरुषोंके लिये यह कौन-सी आश्‍चर्यकी बात है॥ ३०॥

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