वे कभी बड़े भारी भँवरमें पड़ जाते, कभी तरल तरंगोंकी चोटसे चंचल हो उठते। जब कभी जल-जन्तु आपसमें एक-दूसरेपर आक्रमण करते, तब ये अचानक ही उनके शिकार बन जाते॥ १७॥
क्वचिद् गतो महावर्ते तरलैस्ताडितः क्वचित्।
यादोभिर्भक्ष्यते क्वापि स्वयमन्योन्यघातिभिः॥ १७
वे कभी बड़े भारी भँवरमें पड़ जाते, कभी तरल तरंगोंकी चोटसे चंचल हो उठते। जब कभी जल-जन्तु आपसमें एक-दूसरेपर आक्रमण करते, तब ये अचानक ही उनके शिकार बन जाते॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.9.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 955) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/9/17/