॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.9.27
तावच्छिशोर्वै श्वसितेन भार्गवः
सोऽन्तःशरीरं मशको यथाविशत्।
तत्राप्यदो न्यस्तमचष्ट कृत्स्नशो
यथा पुरामुह्यदतीव विस्मितः॥ २७
tāvacchiśorvai śvasitena bhārgavaḥ
so'ntaḥśarīraṃ maśako yathāviśat|
tatrāpyado nyastamacaṣṭa kṛtsnaśo
yathā purāmuhyadatīva vismitaḥ|| 27
अर्थ
अभी मार्कण्डेयजी पहुँच भी न पाये थे कि उस शिशुके श्वासके साथ उसके शरीरके भीतर उसी प्रकार घुस गये, जैसे कोई मच्छर किसीके पेटमें चला जाय। उस शिशुके पेटमें जाकर उन्होंने सब-की-सब वही सृष्टि देखी, जैसी प्रलयके पहले उन्होंने देखी थी। वे वह सब विचित्र दृश्य देखकर आश्चर्यचकित हो गये। वे मोहवश कुछ सोच-विचार भी न सके॥ २७॥