श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.9.3

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

वयं ते परितुष्टाः स्म त्वद‍्बृहद्व्रतचर्यया।

वरं प्रतीच्छ भद्रं ते वरदेशादभीप्सितम्॥ ३

vayaṃ te parituṣṭāḥ sma tvadbṛhadvratacaryayā|

varaṃ pratīccha bhadraṃ te varadeśādabhīpsitam|| 3

अर्थ

तुम्हारे इस आजीवन ब्रह्मचर्य-व्रतकी निष्ठा देखकर हम तुमपर बहुत ही प्रसन्‍न हुए हैं। तुम्हारा कल्याण हो! मैं समस्त वर देनेवालोंका स्वामी हूँ। इसलिये तुम अपना अभीष्ट वर मुझसे माँग लो॥ ३॥✎ 1783

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1783 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: देने-वालोंका → देनेवालोंका

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