श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.1.15

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

अन्तकाले तु३ पुरुष आगते गतसाध्वसः।

छिन्द्यादसङ्गशस्त्रेण स्पृहां देहेऽनु४ ये च तम्॥ १५

antakāle tu puruṣa āgate gatasādhvasaḥ|

chindyādasaṅgaśastreṇa spṛhāṃ dehe'nu ye ca tam|| 15

अर्थ

मृत्युका समय आनेपर मनुष्य घबराये नहीं। उसे चाहिये कि वह वैराग्यके शस्त्रसे शरीर और उससे सम्बन्ध रखनेवालोंके प्रति ममताको काट डाले॥ १५॥✎ 116

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—ऽपि।

    (मुद्रित पृष्ठ 182)
  2. ४

    प्रा० पा०—देहानुयायिनीम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 182)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #116 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में

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