श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.1.23

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

जितासनो जितश्वासो जितसङ्गो जितेन्द्रियः।

स्थूले भगवतो रूपे मनः सन्धारयेद्धिया॥ २३

jitāsano jitaśvāso jitasaṅgo jitendriyaḥ|

sthūle bhagavato rūpe manaḥ sandhārayeddhiyā|| 23

अर्थ

श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! आसन, श्वास, आसक्ति और इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त करके फिर बुद्धिके द्वारा मनको भगवान्‌के स्थूलरूपमें लगाना चाहिये॥ २३॥ यह कार्यरूप सम्पूर्ण विश्‍व जो कुछ कभी था, है या होगा—सब-का-सब जिसमें दीख पड़ता है वही भगवान्‌का स्थूल-से-स्थूल और विराट् शरीर है॥ २४॥

यह व्याख्या श्लोक 2.1.23 से 2.1.24 तककी एक साथ है।

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें