श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.1.24

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

विशेषस्तस्य देहोऽयं स्थविष्ठश्‍च स्थवीयसाम्।

यत्रेदं दृश्यते विश्‍वं भूतं भव्यं भवच्च सत्॥ २४

viśeṣastasya deho'yaṃ sthaviṣṭhaśca sthavīyasām|

yatredaṃ dṛśyate viśvaṃ bhūtaṃ bhavyaṃ bhavacca sat|| 24

अर्थ

यह कार्यरूप सम्पूर्ण विश्‍व जो कुछ कभी था, है या होगा—सब-का-सब जिसमें दीख पड़ता है वही भगवान्‌का स्थूल-से-स्थूल और विराट् शरीर है॥ २४॥

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