श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.1.3

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

निद्रया ह्रियते नक्तं व्यवायेन च वा वयः।

दिवा चार्थेहया राजन् कुटुम्बभरणेन वा॥ ३

nidrayā hriyate naktaṃ vyavāyena ca vā vayaḥ|

divā cārthehayā rājan kuṭumbabharaṇena vā|| 3

अर्थ

उनकी सारी उम्र यों ही बीत जाती है। उनकी रात नींद या स्त्री-प्रसंगसे कटती है और दिन धनकी हाय-हाय या कुटुम्बियोंके भरण-पोषणमें समाप्त हो जाता है॥ ३॥✎ 115

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #115 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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