श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.1.4

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

देहापत्यकलत्रादिष्वात्मसै२न्येष्वसत्स्वपि ।

तेषां प्रमत्तो निधनं पश्यन्‍नपि न पश्यति॥ ४ ✎ 992

dehāpatyakalatrādiṣvātmasainyeṣvasatsvapi |

teṣāṃ pramatto nidhanaṃ paśyannapi na paśyati|| 4

अर्थ

संसारमें जिन्हें अपना अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्धी कहा जाता है, वे शरीर, पुत्र, स्त्री आदि कुछ नहीं हैं, असत् हैं; परन्तु जीव उनके मोहमें ऐसा पागल-सा हो जाता है कि रात-दिन उनको मृत्युका ग्रास होते देखकर भी चेतता नहीं॥ ४॥✎ 115

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—सौख्येष्व०।

    (मुद्रित पृष्ठ 181)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #115 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #992 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): → ४

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