श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.1.38

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

इयानसावीश्‍वरविग्रहस्य

यः सन्‍निवेशः कथितो मया ते।

सन्धार्यतेऽस्मिन् वपुषि स्थविष्ठे

मनः स्वबुद्ध्या न यतोऽस्ति किञ्चित्॥ ३८

iyānasāvīśvaravigrahasya

yaḥ sanniveśaḥ kathito mayā te|

sandhāryate'smin vapuṣi sthaviṣṭhe

manaḥ svabuddhyā na yato'sti kiñcit|| 38

अर्थ

परीक्षित्! विराट्भगवान्के स्थूलशरीरका यही स्वरूप है, सो मैंने तुम्हें सुना दिया। इसीमें मुमुक्षु पुरुष बुद्धिके द्वारा मनको स्थिर करते हैं; क्योंकि इससे भिन्‍न और कोई वस्तु नहीं है॥ ३८॥

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