परीक्षित्! विराट्भगवान्के स्थूलशरीरका यही स्वरूप है, सो मैंने तुम्हें सुना दिया। इसीमें मुमुक्षु पुरुष बुद्धिके द्वारा मनको स्थिर करते हैं; क्योंकि इससे भिन्न और कोई वस्तु नहीं है॥ ३८॥
इयानसावीश्वरविग्रहस्य
यः सन्निवेशः कथितो मया ते।
सन्धार्यतेऽस्मिन् वपुषि स्थविष्ठे
मनः स्वबुद्ध्या न यतोऽस्ति किञ्चित्॥ ३८
परीक्षित्! विराट्भगवान्के स्थूलशरीरका यही स्वरूप है, सो मैंने तुम्हें सुना दिया। इसीमें मुमुक्षु पुरुष बुद्धिके द्वारा मनको स्थिर करते हैं; क्योंकि इससे भिन्न और कोई वस्तु नहीं है॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.1.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 185) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/2/1/38/