श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.1.39

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

स सर्वधीवृत्त्यनुभूतसर्व

आत्मा यथा स्वप्नजनेक्षितैकः।

तं सत्यमानन्दनिधिं भजेत

नान्यत्र सज्जेद् यत आत्मपातः॥ ३९

sa sarvadhīvṛttyanubhūtasarva

ātmā yathā svapnajanekṣitaikaḥ|

taṃ satyamānandanidhiṃ bhajeta

nānyatra sajjed yata ātmapātaḥ|| 39

अर्थ

जैसे स्वप्न देखनेवाला स्वप्नावस्थामें अपने-आपको ही विविध पदार्थोंके रूपमें देखता है, वैसे ही सबकी बुद्धि-वृत्तियोंके द्वारा सब कुछ अनुभव करनेवाला सर्वान्तर्यामी परमात्मा भी एक ही है। उन सत्यस्वरूप आनन्दनिधि भगवान्‌का ही भजन करना चाहिये, अन्य किसी भी वस्तुमें आसक्ति नहीं करनी चाहिये। क्योंकि यह आसक्ति जीवके अधःपतनका हेतु है॥ ३९॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे
महापुरुषसंस्थानुवर्णने प्रथमोऽध्यायः॥ १॥

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