॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.10.15
अन्तःशरीर आकाशात् पुरुषस्य विचेष्टतः।
ओजः सहो बलं जज्ञे ३ ततः प्राणो महानसुः॥ १५
antaḥśarīra ākāśāt puruṣasya viceṣṭataḥ|
ojaḥ saho balaṃ jajñe tataḥ prāṇo mahānasuḥ|| 15
अर्थ
विराट् पुरुषके हिलने-डोलनेपर उनके शरीरमें रहनेवाले आकाशसे इन्द्रियबल, मनोबल और शरीरबलकी उत्पत्ति हुई। उनसे इन सबका राजा प्राण उत्पन्न हुआ॥ १५॥ जैसे सेवक अपने स्वामी राजाके पीछे-पीछे चलते हैं, वैसे ही सबके शरीरोंमें प्राणके प्रबल रहनेपर ही सारी इन्द्रियाँ प्रबल रहती हैं और जब वह सुस्त पड़ जाता है, तब सारी इन्द्रियाँ भी सुस्त हो जाती हैं॥ १६॥
टिप्पणियाँ
- ३
प्रा० पा०—तेजस्ततः।