श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.10.14

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

अधिदैवमथाध्यात्ममधिभूतमिति प्रभुः।

यथैकं पौरुषं वीर्यं त्रिधाभिद्यत तच्छृणु॥ १४

adhidaivamathādhyātmamadhibhūtamiti prabhuḥ|

yathaikaṃ pauruṣaṃ vīryaṃ tridhābhidyata tacchṛṇu|| 14

अर्थ

उन अद्वितीय भगवान् नारायणने योगनिद्रासे जगकर अनेक होनेकी इच्छा की। तब अपनी मायासे उन्होंने अखिल ब्रह्माण्डके बीजस्वरूप अपने सुवर्णमय वीर्यको तीन भागोंमें विभक्त कर दिया—अधिदैव, अध्यात्म और अधिभूत। परीक्षित्! विराट् पुरुषका एक ही वीर्य तीन भागोंमें कैसे विभक्त हुआ, सो सुनो॥ १३-१४॥✎ 180

यह अर्थ श्लोक 13–14 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #180 शब्दोंके बीचका स्थान: नारायणभगवान् की → नारायणभगवान्‌की

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