श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.10.13

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

एको नानात्वमन्विच्छन् योगतल्पात् समुत्थितः।

वीर्यं हिरण्मयं देवो मायया व्यसृजत् त्रिधा॥ १३

eko nānātvamanvicchan yogatalpāt samutthitaḥ|

vīryaṃ hiraṇmayaṃ devo māyayā vyasṛjat tridhā|| 13

अर्थ

उन अद्वितीय भगवान् नारायणने योगनिद्रासे जगकर अनेक होनेकी इच्छा की। तब अपनी मायासे उन्होंने अखिल ब्रह्माण्डके बीजस्वरूप अपने सुवर्णमय वीर्यको तीन भागोंमें विभक्त कर दिया—अधिदैव, अध्यात्म और अधिभूत। परीक्षित्! विराट् पुरुषका एक ही वीर्य तीन भागोंमें कैसे विभक्त हुआ, सो सुनो॥ १३-१४॥✎ 180

यह अर्थ श्लोक 13–14 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #180 शब्दोंके बीचका स्थान: नारायणभगवान् की → नारायणभगवान्‌की

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