जब प्राण जोरसे आने-जाने लगा, तब विराट् पुरुषको भूख-प्यासका अनुभव हुआ। खाने-पीनेकी इच्छा करते ही सबसे पहले उनके शरीरमें मुख प्रकट हुआ॥ १७॥
प्राणेन क्षिपता क्षुत् तृडन्तरा जायते प्रभोः।
पिपासतो जक्षतश्च प्राङ्मुखं निरभिद्यत॥ १७
जब प्राण जोरसे आने-जाने लगा, तब विराट् पुरुषको भूख-प्यासका अनुभव हुआ। खाने-पीनेकी इच्छा करते ही सबसे पहले उनके शरीरमें मुख प्रकट हुआ॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.10.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 230) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/17/