॥ श्रीहरिः ॥
मुखतस्तालु निर्भिन्नं जिह्वा तत्रोपजायते।
ततो नानारसो जज्ञे जिह्वया योऽधिगम्यते॥ १८
mukhatastālu nirbhinnaṃ jihvā tatropajāyate|
tato nānāraso jajñe jihvayā yo'dhigamyate|| 18
अर्थ
मुखसे तालु और तालुसे रसनेन्द्रिय प्रकट हुई। इसके बाद अनेकों प्रकारके रस उत्पन्न हुए, जिन्हें रसना ग्रहण करती है॥ १८॥
मुखतस्तालु निर्भिन्नं जिह्वा तत्रोपजायते।
ततो नानारसो जज्ञे जिह्वया योऽधिगम्यते॥ १८
मुखसे तालु और तालुसे रसनेन्द्रिय प्रकट हुई। इसके बाद अनेकों प्रकारके रस उत्पन्न हुए, जिन्हें रसना ग्रहण करती है॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.10.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 230) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/18/