श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.10.18

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

मुखतस्तालु निर्भिन्‍नं जिह्वा तत्रोपजायते।

ततो नानारसो जज्ञे जिह्वया योऽधिगम्यते॥ १८

mukhatastālu nirbhinnaṃ jihvā tatropajāyate|

tato nānāraso jajñe jihvayā yo'dhigamyate|| 18

अर्थ

मुखसे तालु और तालुसे रसनेन्द्रिय प्रकट हुई। इसके बाद अनेकों प्रकारके रस उत्पन्‍न हुए, जिन्हें रसना ग्रहण करती है॥ १८॥

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