श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.10.46

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

अयं तु ब्रह्मणः कल्पः सविकल्प उदाहृतः।

विधिः साधारणो यत्र सर्गाः प्राकृतवैकृताः॥ ४६

ayaṃ tu brahmaṇaḥ kalpaḥ savikalpa udāhṛtaḥ|

vidhiḥ sādhāraṇo yatra sargāḥ prākṛtavaikṛtāḥ|| 46

अर्थ

यह मैंने ब्रह्माजीके महाकल्पका अवान्तर कल्पोंके साथ वर्णन किया है। सब कल्पोंमें सृष्टिक्रम एक-सा ही है। अन्तर है तो केवल इतना ही कि महाकल्पके प्रारम्भमें प्रकृतिसे क्रमशः महत्तत्त्वादिकी उत्पत्ति होती है और कल्पोंके प्रारम्भमें प्राकृत सृष्टि तो ज्यों-की-त्यों रहती ही है, चराचर प्राणियोंकी वैकृत सृष्टि नवीन रूपसे होती है॥ ४६॥✎ 182 1583

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #182 शब्दोंके बीचका स्थान: परीक्षित् ! → परीक्षित्!
  • #1583 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: सृष्टि-क्रम → सृष्टिक्रम

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