श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.10.47

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

परिमाणं च कालस्य कल्पलक्षणविग्रहम्।

यथा पुरस्ताद‍्व्याख्यास्ये पाद्मं कल्पमथो३ शृणु॥ ४७

parimāṇaṃ ca kālasya kalpalakṣaṇavigraham|

yathā purastādvyākhyāsye pādmaṃ kalpamatho śṛṇu|| 47

अर्थ

परीक्षित्! कालका परिमाण, कल्प और उसके अन्तर्गत मन्वन्तरोंका वर्णन आगे चलकर करेंगे। अब तुम पाद्मकल्पका वर्णन सावधान होकर सुनो॥ ४७॥✎ 182 1583

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—कल्पमिमं।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 233)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #182 शब्दोंके बीचका स्थान: परीक्षित् ! → परीक्षित्!
  • #1583 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: सृष्टि-क्रम → सृष्टिक्रम

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