शौनकजीने पूछा—सूतजी! आपने हमलोगोंसे कहा था कि भगवान्के परम भक्त विदुरजीने अपने अति दुस्त्यज कुटुम्बियोंको भी छोड़कर पृथ्वीके विभिन्न तीर्थोंमें विचरण किया था॥ ४८॥
यदाह नो भवान् सूत क्षत्ता भागवतोत्तमः।
चचार तीर्थानि भुवस्त्यक्त्वा बन्धून् सुदुस्त्यजान्॥ ४८
शौनकजीने पूछा—सूतजी! आपने हमलोगोंसे कहा था कि भगवान्के परम भक्त विदुरजीने अपने अति दुस्त्यज कुटुम्बियोंको भी छोड़कर पृथ्वीके विभिन्न तीर्थोंमें विचरण किया था॥ ४८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.10.48 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 233) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/2/10/48/