श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.3.20

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

बिले बतोरुक्रमविक्रमान् ये

न शृण्वतः कर्णपुटे नरस्य।

जिह्वासती दार्दुरिकेव सूत

न चोपगायत्युरुगायगाथाः॥ २०

bile batorukramavikramān ye

na śṛṇvataḥ karṇapuṭe narasya|

jihvāsatī dārdurikeva sūta

na copagāyatyurugāyagāthāḥ|| 20

अर्थ

सूतजी! जो मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णकी कथा कभी नहीं सुनता, उसके कान बिलके समान हैं। जो जीभ भगवान्‌की लीलाओंका गायन नहीं करती, वह मेढककी जीभके समान टर्र-टर्र करनेवाली है; उसका तो न रहना ही अच्छा है॥ २०॥ जो सिर कभी भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें झुकता नहीं, वह रेशमी वस्त्रसे सुसज्जित और मुकुटसे युक्त होनेपर भी बोझामात्र ही है। जो हाथ भगवान्‌की सेवा-पूजा नहीं करते, वे सोनेके कंगनसे भूषित होनेपर भी मुर्देके हाथ हैं॥ २१॥ जो आँखें भगवान्‌की याद दिलानेवाली मूर्ति, तीर्थ, नदी आदिका दर्शन नहीं करतीं, वे मोरोंकी पाँखमें बने हुए आँखोंके चिह्नके समान निरर्थक हैं। मनुष्योंके वे पैर चलनेकी शक्ति रखनेपर भी न चलनेवाले पेड़ों-जैसे ही हैं, जो भगवान्‌की लीला-स्थलियोंकी यात्रा नहीं करते॥ २२॥ ✎ 129 130 131 132

यह व्याख्या श्लोक 2.3.20 से 2.3.22 तककी एक साथ है।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #129 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #130 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #131 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #132 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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