श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.3.21

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

भारः परं पट्टकिरीटजुष्ट-

मप्युत्तमाङ्गं न नमेन्मुकुन्दम्।

शावौ करौ नो कुरुतः सपर्यां

हरेर्लसत्काञ्चनकङ्कणौ वा॥ २१

bhāraḥ paraṃ paṭṭakirīṭajuṣṭa-

mapyuttamāṅgaṃ na namenmukundam|

śāvau karau no kurutaḥ saparyāṃ

harerlasatkāñcanakaṅkaṇau vā|| 21

अर्थ

जो सिर कभी भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें झुकता नहीं, वह रेशमी वस्त्रसे सुसज्जित और मुकुटसे युक्त होनेपर भी बोझामात्र ही है। जो हाथ भगवान्‌की सेवा-पूजा नहीं करते, वे सोनेके कंगनसे भूषित होनेपर भी मुर्देके हाथ हैं॥ २१॥✎ 129 130 131 132

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #129 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #130 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #131 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #132 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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