॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.3.23
जीवञ्छवो भागवताङ्घ्रिरेणुं
न जातु मर्त्योऽभिलभेत यस्तु।
श्रीविष्णुपद्या मनुजस्तुलस्याः
श्वसञ्छवो यस्तु न वेद गन्धम्॥ २३
jīvañchavo bhāgavatāṅghrireṇuṃ
na jātu martyo'bhilabheta yastu|
śrīviṣṇupadyā manujastulasyāḥ
śvasañchavo yastu na veda gandham|| 23
अर्थ
जिस मनुष्यने भगवत्प्रेमी संतोंके चरणोंकी धूल कभी सिरपर नहीं चढ़ायी, वह जीता हुआ भी मुर्दा है। जिस मनुष्यने भगवान्के चरणोंपर चढ़ी हुई तुलसीकी सुगन्ध लेकर उसकी सराहना नहीं की, वह श्वास लेता हुआ भी श्वासरहित शव है॥ २३॥