॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.3.24
तदश्मसारं हृदयं बतेदं
यद् गृह्यमाणैर्हरिनामधेयैः।
न विक्रियेताथ यदा विकारो
नेत्रे जलं गात्ररुहेषु हर्षः॥ २४
tadaśmasāraṃ hṛdayaṃ batedaṃ
yad gṛhyamāṇairharināmadheyaiḥ|
na vikriyetātha yadā vikāro
netre jalaṃ gātraruheṣu harṣaḥ|| 24
अर्थ
सूतजी! वह हृदय नहीं लोहा है, जो भगवान्के मंगलमय नामोंका श्रवण-कीर्तन करनेपर भी पिघलकर उन्हींकी ओर बह नहीं जाता। जिस समय हृदय पिघल जाता है, उस समय नेत्रोंमें आँसू छलकने लगते हैं और शरीरका रोम-रोम खिल उठता है॥ २४॥