धर्म-उपार्जन करनेके लिये विष्णुभगवान्की, वंशपरम्पराकी रक्षाके लिये पितरोंकी, बाधाओंसे बचनेके लिये यक्षोंकी और बलवान् होनेके लिये मरुद्गणोंकी आराधना करनी चाहिये ॥ ८॥✎ 122123124125126128612871288
धर्मार्थ उत्तमश्लोकं तन्तुं तन्वन् पितॄन् यजेत्।
रक्षाकामः पुण्यजनानोजस्कामो मरुद्गणान्॥ ८
धर्म-उपार्जन करनेके लिये विष्णुभगवान्की, वंशपरम्पराकी रक्षाके लिये पितरोंकी, बाधाओंसे बचनेके लिये यक्षोंकी और बलवान् होनेके लिये मरुद्गणोंकी आराधना करनी चाहिये ॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.3.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 193) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/2/3/8/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (8)