श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.3.9

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

राज्यकामो मनून् देवान् निर्ऋतिं त्वभिचरन् यजेत्।✎ 994 995 1866

कामकामो यजेत् सोममकामः पुरुषं परम् ॥ ९

rājyakāmo manūn devān nir:ṛtiṃ tvabhicaran yajet|

kāmakāmo yajet somamakāmaḥ puruṣaṃ param || 9

अर्थ

राज्यके लिये मन्वन्तरोंके अधिपति देवोंको, अभिचारके लिये निर्ऋतिको, भोगोंके लिये चन्द्रमाको और निष्कामता प्राप्त करनेके लिये परम पुरुष नारायणको भजना चाहिये॥ ९॥✎ 122 123 124 125 126 1286 1287 1288

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (11)
  • #122 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #123 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #124 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में
  • #125 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #126 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णु-भगवान् की, → विष्णु-भगवान्‌की,
  • #994 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्तिंत्वभिचरन् → निऋर्ऋतिंत्वभिचरन्
  • #995 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋतिंत्वभिचरन् → निर्ऋतिंत्वभिचरन्
  • #1286 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्तिको, → निऋर्ऋतिको,
  • #1287 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋतिको, → निर्ऋतिको,
  • #1288 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विष्णु-भगवान्‌की, → विष्णुभगवान्‌की,
  • #1866 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): तिंत्वभि → तिं त्वभि

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