श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.4.15

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

यत्कीर्तनं यत्स्मरणं यदीक्षणं

यद्वन्दनं यच्छ्रवणं यदर्हणम्।

लोकस्य सद्यो विधुनोति कल्मषं

तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः॥ १५

yatkīrtanaṃ yatsmaraṇaṃ yadīkṣaṇaṃ

yadvandanaṃ yacchravaṇaṃ yadarhaṇam|

lokasya sadyo vidhunoti kalmaṣaṃ

tasmai subhadraśravase namo namaḥ|| 15

अर्थ

जिनका कीर्तन, स्मरण, दर्शन, वन्दन, श्रवण और पूजन जीवोंके पापोंको तत्काल नष्ट कर देता है, उन पुण्यकीर्ति भगवान् श्रीकृष्णको बार-बार नमस्कार है॥ १५॥✎ 134 135

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #134 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #135 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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