श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.4.16

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

विचक्षणा यच्चरणोपसादनात्

सङ्ग व्युदस्योभयतोऽन्तरात्मनः।

विन्दन्ति हि ब्रह्मगतिं गतक्लमा-

स्तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः॥ १६

vicakṣaṇā yaccaraṇopasādanāt

saṅga vyudasyobhayato'ntarātmanaḥ|

vindanti hi brahmagatiṃ gataklamā-

stasmai subhadraśravase namo namaḥ|| 16

अर्थ

विवेकी पुरुष जिनके चरणकमलोंकी शरण लेकर अपने हृदयसे इस लोक और परलोककी आसक्ति निकाल डालते हैं और बिना किसी परिश्रमके ही ब्रह्मपदको प्राप्त कर लेते हैं, उन मंगलमय कीर्तिवाले भगवान् श्रीकृष्णको अनेक बार नमस्कार है॥ १६॥✎ 134 135

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #134 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #135 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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