श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.4.17

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

तपस्विनो दानपरा यशस्विनो

मनस्विनो मन्त्रविदः सुमङ्गलाः।

क्षेमं न विन्दन्ति विना यदर्पणं

तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः॥ १७

tapasvino dānaparā yaśasvino

manasvino mantravidaḥ sumaṅgalāḥ|

kṣemaṃ na vindanti vinā yadarpaṇaṃ

tasmai subhadraśravase namo namaḥ|| 17

अर्थ

बड़े-बड़े तपस्वी, दानी, यशस्वी, मनस्वी, सदाचारी और मन्त्रवेत्ता जबतक अपनी साधनाओंको तथा अपने-आपको उनके चरणोंमें समर्पित नहीं कर देते, तबतक उन्हें कल्याणकी प्राप्ति नहीं होती। जिनके प्रति आत्मसमर्पणकी ऐसी महिमा है, उन कल्याणमयी कीर्तिवाले भगवान्‌को बार-बार नमस्कार है॥ १७॥✎ 134 135

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #134 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #135 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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