श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.4.18

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुल्कसा

आभीरकङ्का यवनाः खसादयः।

येऽन्ये च पापा यदुपाश्रयाश्रयाः

शुध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः॥ १८

kirātahūṇāndhrapulindapulkasā

ābhīrakaṅkā yavanāḥ khasādayaḥ|

ye'nye ca pāpā yadupāśrayāśrayāḥ

śudhyanti tasmai prabhaviṣṇave namaḥ|| 18

अर्थ

किरात, हूण, आन्ध्र, पुलिन्द, पुल्कस, आभीर, कंक, यवन और खस आदि नीच जातियाँ तथा दूसरे पापी जिनके शरणागत भक्तोंकी शरण ग्रहण करनेसे ही पवित्र हो जाते हैं, उन सर्वशक्तिमान् भगवान्‌को बार-बार नमस्कार है॥ १८॥✎ 134 135

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #134 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #135 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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