श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.4.22

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

प्रचोदिता येन पुरा सरस्वती

वितन्वता१जस्य सतीं स्मृतिं हृदि।

स्२वलक्षणा प्रादुरभूत् किलास्यतः

स मे ऋषीणामृषभः प्रसीदताम्॥ २२

pracoditā yena purā sarasvatī

vitanvatājasya satīṃ smṛtiṃ hṛdi|

svalakṣaṇā prādurabhūt kilāsyataḥ

sa me ṛṣīṇāmṛṣabhaḥ prasīdatām|| 22

अर्थ

जिन्होंने सृष्टिके समय ब्रह्माके हृदयमें पूर्वकल्पकी स्मृति जागरित करनेके लिये ज्ञानकी अधिष्ठात्री देवीको प्रेरित किया और वे अपने अंगोंके सहित वेदके रूपमें उनके मुखसे प्रकट हुईं, वे ज्ञानके मूलकारण भगवान् मुझपर कृपा करें, मेरे हृदयमें प्रकट हों॥ २२॥✎ 134 135

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—वितन्वतोऽजस्य।

    (मुद्रित पृष्ठ 198)
  2. २

    प्रा० पा०—विलक्षणा।

    (मुद्रित पृष्ठ 198)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #134 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #135 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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