श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.4.23

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

भूतैर्महद्भिर्य इमाः पुरो विभु-

र्निर्माय शेते यदमूषु पूरुषः।

भुङ्क्ते गुणान् षोडश षोडशात्मकः

सोऽलङ्कृषीष्ट भगवान् वचांसि मे॥ २३

bhūtairmahadbhirya imāḥ puro vibhu-

rnirmāya śete yadamūṣu pūruṣaḥ|

bhuṅkte guṇān ṣoḍaśa ṣoḍaśātmakaḥ

so'laṅkṛṣīṣṭa bhagavān vacāṃsi me|| 23

अर्थ

भगवान् ही पंचमहाभूतोंसे इन शरीरोंका निर्माण करके इनमें जीवरूपसे शयन करते हैं और पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच प्राण और एक मन—इन सोलह कलाओंसे युक्त होकर इनके द्वारा सोलह विषयोंका भोग करते हैं। वे सर्वभूतमय भगवान् मेरी वाणीको अपने गुणोंसे अलंकृत कर दें॥ २३॥✎ 134 135

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #134 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #135 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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