भगवान् कैसे इस विश्वकी रक्षा और फिर संहार करते हैं? अनन्तशक्ति परमात्मा किन-किन शक्तियोंका आश्रय लेकर अपने-आपको ही खिलौने बनाकर खेलते हैं? वे बच्चोंके बनाये हुए घरौंदोंकी तरह ब्रह्माण्डोंको कैसे बनाते हैं और फिर किस प्रकार बात-की-बातमें मिटा देते हैं?॥ ७॥✎ 133
यथा गोपायति विभुर्यथा संयच्छते पुनः।
यां यां शक्तिमुपाश्रित्य पुरुशक्तिः परः पुमान्।
आत्मानं क्रीडयन् क्रीडन् करोति विकरोति च॥ ७
भगवान् कैसे इस विश्वकी रक्षा और फिर संहार करते हैं? अनन्तशक्ति परमात्मा किन-किन शक्तियोंका आश्रय लेकर अपने-आपको ही खिलौने बनाकर खेलते हैं? वे बच्चोंके बनाये हुए घरौंदोंकी तरह ब्रह्माण्डोंको कैसे बनाते हैं और फिर किस प्रकार बात-की-बातमें मिटा देते हैं?॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.4.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 196) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/2/4/7/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)