भगवान् श्रीहरिकी लीलाएँ बड़ी ही अद्भुत—अचिन्त्य हैं। इसमें संदेह नहीं कि बड़े-बड़े विद्वानोंके लिये भी उनकी लीलाका रहस्य समझना अत्यन्त कठिन प्रतीत होता है॥ ८॥✎ 133
नूनं भगवतो ब्रह्मन् हरेरद्भुतकर्मणः।
दुर्विभाव्यमिवाभाति कविभिश्चापि चेष्टितम्॥ ८
भगवान् श्रीहरिकी लीलाएँ बड़ी ही अद्भुत—अचिन्त्य हैं। इसमें संदेह नहीं कि बड़े-बड़े विद्वानोंके लिये भी उनकी लीलाका रहस्य समझना अत्यन्त कठिन प्रतीत होता है॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.4.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 196) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/4/8/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)