वेद नारायणके परायण हैं। देवता भी नारायणके ही अंगोंमें कल्पित हुए हैं और समस्त यज्ञ भी नारायणकी प्रसन्नताके लिये ही हैं तथा उनसे जिन लोकोंकी प्राप्ति होती है, वे भी नारायणमें ही कल्पित हैं॥ १५॥✎ 1361581
नारायणपरा वेदा देवा नारायणाङ्गजाः।
नारायणपरा लोका नारायणपरा मखाः॥ १५
वेद नारायणके परायण हैं। देवता भी नारायणके ही अंगोंमें कल्पित हुए हैं और समस्त यज्ञ भी नारायणकी प्रसन्नताके लिये ही हैं तथा उनसे जिन लोकोंकी प्राप्ति होती है, वे भी नारायणमें ही कल्पित हैं॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.5.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 200) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/2/5/15/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)