श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.5.16

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

नारायणपरो योगो नारायणपरं तपः।

नारायणपरं ज्ञानं नारायणपरा गतिः॥ १६

nārāyaṇaparo yogo nārāyaṇaparaṃ tapaḥ|

nārāyaṇaparaṃ jñānaṃ nārāyaṇaparā gatiḥ|| 16

अर्थ

सब प्रकारके योग भी नारायणकी प्राप्तिके ही हेतु हैं। सारी तपस्याएँ नारायणकी ओर ही ले जानेवाली हैं, ज्ञानके द्वारा भी नारायण ही जाने जाते हैं। समस्त साध्य और साधनोंका पर्यवसान भगवान् नारायणमें ही है॥ १६॥✎ 136 1581

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #136 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1581 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: इच्छा-नुसार → इच्छानुसार

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें