श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.5.17

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

तस्यापि द्रष्टुरीशस्य कूटस्थस्याखिलात्मनः।

सृज्यं सृजामि सृष्टोऽहमीक्षयैवाभिचोदितः॥ १७

tasyāpi draṣṭurīśasya kūṭasthasyākhilātmanaḥ|

sṛjyaṃ sṛjāmi sṛṣṭo'hamīkṣayaivābhicoditaḥ|| 17

अर्थ

वे द्रष्टा होनेपर भी ईश्‍वर हैं, स्वामी हैं; निर्विकार होनेपर भी सर्वस्वरूप हैं। उन्होंने ही मुझे बनाया है और उनकी दृष्टिसे ही प्रेरित होकर मैं उनके इच्छानुसार सृष्टि-रचना करता हूँ॥ १७॥✎ 136 1581

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #136 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1581 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: इच्छा-नुसार → इच्छानुसार

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