वे द्रष्टा होनेपर भी ईश्वर हैं, स्वामी हैं; निर्विकार होनेपर भी सर्वस्वरूप हैं। उन्होंने ही मुझे बनाया है और उनकी दृष्टिसे ही प्रेरित होकर मैं उनके इच्छानुसार सृष्टि-रचना करता हूँ॥ १७॥✎ 1361581
तस्यापि द्रष्टुरीशस्य कूटस्थस्याखिलात्मनः।
सृज्यं सृजामि सृष्टोऽहमीक्षयैवाभिचोदितः॥ १७
वे द्रष्टा होनेपर भी ईश्वर हैं, स्वामी हैं; निर्विकार होनेपर भी सर्वस्वरूप हैं। उन्होंने ही मुझे बनाया है और उनकी दृष्टिसे ही प्रेरित होकर मैं उनके इच्छानुसार सृष्टि-रचना करता हूँ॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.5.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 200) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/2/5/17/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)