श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.5.18

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

सत्त्वं रजस्तम इति निर्गुणस्य गुणास्त्रयः।

स्थितिसर्गनिरोधेषु गृहीता मायया विभोः॥ १८

sattvaṃ rajastama iti nirguṇasya guṇāstrayaḥ|

sthitisarganirodheṣu gṛhītā māyayā vibhoḥ|| 18

अर्थ

भगवान् मायाके गुणोंसे रहित एवं अनन्त हैं। सृष्टि, स्थिति और प्रलयके लिये रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुण—ये तीन गुण मायाके द्वारा उनमें स्वीकार किये गये हैं॥ १८॥✎ 136 1581

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #136 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1581 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: इच्छा-नुसार → इच्छानुसार

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