श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.5.20

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

स एष भगवाँल्लिङ्गैस्त्रिभिरेभिरधोक्षजः।

स्वलक्षितगतिर्ब्रह्मन् सर्वेषां मम चेश्‍वरः॥ २०

sa eṣa bhagavām̐lliṅgaistribhirebhiradhokṣajaḥ|

svalakṣitagatirbrahman sarveṣāṃ mama ceśvaraḥ|| 20

अर्थ

नारद! इन्द्रियातीत भगवान् गुणोंके इन तीन आवरणोंसे अपने स्वरूपको भलीभाँति ढक लेते हैं, इसलिये लोग उनको नहीं जान पाते। सारे संसारके और मेरे भी एकमात्र स्वामी वे ही हैं॥ २०॥✎ 136 1581

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #136 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1581 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: इच्छा-नुसार → इच्छानुसार

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