श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.5.28

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

तेजसस्तु विकुर्वाणादासीदम्भो रसात्मकम्।

रूपवत् स्पर्शवच्चाम्भो घोषवच्च परान्वयात्॥ २८

tejasastu vikurvāṇādāsīdambho rasātmakam|

rūpavat sparśavaccāmbho ghoṣavacca parānvayāt|| 28

अर्थ

तेजके विकारसे जलकी उत्पत्ति हुई। इसका गुण है रस; कारण-तत्त्वोंके गुण शब्द, स्पर्श और रूप भी इसमें हैं॥ २८॥✎ 137 138

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #137 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #138 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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