श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.5.36

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

यस्येहावयवैर्लोकान् कल्पयन्ति मनीषिणः।

कट्यादिभिरधः सप्त सप्तोर्ध्वं जघनादिभिः॥ ३६

yasyehāvayavairlokān kalpayanti manīṣiṇaḥ|

kaṭyādibhiradhaḥ sapta saptordhvaṃ jaghanādibhiḥ|| 36

अर्थ

विद्वान् पुरुष (उपासनाके लिये) उसीके अंगोंमें समस्त लोक और उनमें रहनेवाली वस्तुओंकी कल्पना करते हैं। उसकी कमरसे नीचेके अंगोंमें सातों पातालकी और उसके पेड़ूसे ऊपरके अंगोंमें सातों स्वर्गकी कल्पना की जाती है॥ ३६॥✎ 139 140

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #139 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #140 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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