श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.5.37

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

पुरुषस्य मुखं ब्रह्म क्षत्रमेतस्य बाहवः।

ऊर्वोर्वैश्यो भगवतः पद‍्भ्यां शूद्रोऽभ्यजायत॥ ३७

puruṣasya mukhaṃ brahma kṣatrametasya bāhavaḥ|

ūrvorvaiśyo bhagavataḥ padbhyāṃ śūdro'bhyajāyata|| 37

अर्थ

ब्राह्मण इस विराट् पुरुषका मुख है, भुजाएँ क्षत्रिय हैं, जाँघोंसे वैश्य और पैरोंसे शूद्र उत्पन्‍न हुए हैं॥ ३७॥✎ 139 140

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #139 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #140 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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