पिताजी! आपको यह ज्ञान कहाँसे मिला? आप किसके आधारपर ठहरे हुए हैं? आपका स्वामी कौन है? और आपका स्वरूप क्या है? आप अकेले ही अपनी मायासे पंचभूतोंके द्वारा प्राणियोंकी सृष्टि कर लेते हैं, कितना अद्भुत है!॥ ४॥
यद्विज्ञानो यदाधारो यत्परस्त्वं यदात्मकः।
एकः सृजसि भूतानि भूतैरेवात्ममायया॥ ४
पिताजी! आपको यह ज्ञान कहाँसे मिला? आप किसके आधारपर ठहरे हुए हैं? आपका स्वामी कौन है? और आपका स्वरूप क्या है? आप अकेले ही अपनी मायासे पंचभूतोंके द्वारा प्राणियोंकी सृष्टि कर लेते हैं, कितना अद्भुत है!॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.5.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 199) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/2/5/4/