॥ श्रीहरिः ॥
तत्कट्यां चातलं क्लृप्तमूरुभ्यां वितलं विभोः।
जानुभ्यां सुतलं शुद्धं जङ्घाभ्यां तु तलातलम्॥ ४०
tatkaṭyāṃ cātalaṃ klṛptamūrubhyāṃ vitalaṃ vibhoḥ|
jānubhyāṃ sutalaṃ śuddhaṃ jaṅghābhyāṃ tu talātalam|| 40
अर्थ
उस विराट् पुरुषकी कमरमें अतल, जाँघोंमें वितल, घुटनोंमें पवित्र सुतललोक और जंघाओंमें तलातलकी कल्पना की गयी है॥ ४०॥
तत्कट्यां चातलं क्लृप्तमूरुभ्यां वितलं विभोः।
जानुभ्यां सुतलं शुद्धं जङ्घाभ्यां तु तलातलम्॥ ४०
उस विराट् पुरुषकी कमरमें अतल, जाँघोंमें वितल, घुटनोंमें पवित्र सुतललोक और जंघाओंमें तलातलकी कल्पना की गयी है॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.5.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 203) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/2/5/40/