भूर्लोकः कल्पितः पद्भ्यां भुवर्लोकोऽस्य नाभितः।
स्वर्लोकः कल्पितो मूर्ध्ना इति वा लोककल्पना॥ ४२
विराट् भगवान्के अंगोंमें इस प्रकार भी लोकोंकी कल्पना की जाती है कि उनके चरणोंमें पृथ्वी है, नाभिमें भुवर्लोक है और सिरमें स्वर्लोक है॥ ४२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.5.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 203) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/2/5/42/