॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.6.21
यस्मादण्डं विराड् जज्ञे भूतेन्द्रियगुणात्मकः६।
yasmādaṇḍaṃ virāḍ jajñe bhūtendriyaguṇātmakaḥ|
tad dravyamatyagād viśvaṃ gobhiḥ sūrya ivātapan|| 21
अर्थ
जैसे सूर्य अपनी किरणोंसे सबको प्रकाशित करते हुए भी सबसे अलग हैं, वैसे ही जिन परमात्मासे इस अण्डकी और पंचभूत, एकादश इन्द्रिय एवं गुणमय विराट्की उत्पत्ति हुई है—वे प्रभु भी इन समस्त वस्तुओंके अंदर और उनके रूपमें रहते हुए भी उनसे सर्वथा अतीत हैं॥ २१॥✎ 1582
टिप्पणियाँ
- ६
प्रा० पा०—गुणाश्रयः।
- ७
प्रा० पा०—इवातपत्।