श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.6.32

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

इति तेऽभिहितं तात यथेदमनुपृच्छसि।

नान्यद्भगवतः किञ्चिद्भाव्यं सदसदात्मकम्॥ ३२

iti te'bhihitaṃ tāta yathedamanupṛcchasi|

nānyadbhagavataḥ kiñcidbhāvyaṃ sadasadātmakam|| 32

अर्थ

बेटा! जो कुछ तुमने पूछा था, उसका उत्तर मैंने तुम्हें दे दिया; भाव या अभाव, कार्य या कारणके रूपमें ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है जो भगवान्‌से भिन्‍न हो॥ ३२॥✎ 141 142

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #141 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #142 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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