॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.6.33
न भारती मेऽङ्ग मृषोपलक्ष्यते
न४ वै क्वचिन्मे मनसो मृषा गतिः।
न मे हृषीकाणि पतन्त्यसत्पथे
यन्मे हृदौत्कण्ठ्यवता धृतो हरिः॥ ३३
na bhāratī me'ṅga mṛṣopalakṣyate
na vai kvacinme manaso mṛṣā gatiḥ|
na me hṛṣīkāṇi patantyasatpathe
yanme hṛdautkaṇṭhyavatā dhṛto hariḥ|| 33
अर्थ
प्यारे नारद! मैं प्रेमपूर्ण एवं उत्कण्ठित हृदयसे भगवान्के स्मरणमें मग्न रहता हूँ, इसीसे मेरी वाणी कभी असत्य होती नहीं दीखती, मेरा मन कभी असत्य संकल्प नहीं करता और मेरी इन्द्रियाँ भी कभी मर्यादाका उल्लंघन करके कुमार्गमें नहीं जातीं॥ ३३॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—न कर्हिचिन्मे।