॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.6.34
सोऽहं समाम्नायमयस्तपोमयः
प्रजापतीनामभिवन्दितः पतिः।
आस्थाय योगं निपुणं समाहित-
स्तं नाध्यगच्छं यत आत्मसम्भवः॥ ३४
so'haṃ samāmnāyamayastapomayaḥ
prajāpatīnāmabhivanditaḥ patiḥ|
āsthāya yogaṃ nipuṇaṃ samāhita-
staṃ nādhyagacchaṃ yata ātmasambhavaḥ|| 34
अर्थ
मैं वेदमूर्ति हूँ, मेरा जीवन तपस्यामय है, बड़े-बड़े प्रजापति मेरी वन्दना करते हैं और मैं उनका स्वामी हूँ। पहले मैंने बड़ी निष्ठासे योगका सर्वांग अनुष्ठान किया था, परन्तु मैं अपने मूलकारण परमात्माके स्वरूपको नहीं जान सका॥ ३४॥